30 May 2021 HINDI Murli Today – Brahma Kumaris

May 29, 2021

Morning Murli. Om Shanti. Madhuban.

Brahma Kumaris

आज की शिव बाबा की साकार मुरली, बापदादा, मधुबन।  Brahma Kumaris (BK) Murli for today in Hindi. SourceOfficial Murli blog to read and listen daily murlis. पढ़े: मुरली का महत्त्व

मनन करने की विधि तथा मनन शक्ति को बढ़ाने की युक्तियां

♫ मुरली सुने (audio)➤

आज रत्नागर बाप अपने अमूल्य रत्नों से मिलने आये हैं कि हर एक श्रेष्ठ आत्मा ने कितने ज्ञान-रत्न जमा किये अर्थात् जीवन में धारण किये हैं? एक-एक ज्ञान रत्न पदमों से भी ज्यादा मूल्यवान है! तो सोचो, आदि से अब तक कितने ज्ञान रत्न मिले हैं! रत्नागर बाप ने हर एक बच्चे की बुद्धि रूपी झोली में अनेकानेक रत्न भर दिये हैं। सभी बच्चों को एक साथ एक जितने ही ज्ञान रत्न दिये हैं। लेकिन यह ज्ञान-रत्न जितना स्व प्रति व अन्य आत्माओं के प्रति कार्य में लगाते हैं, उतना यह रत्न बढ़ते जाते हैं। बापदादा देख रहे हैं-बाप ने तो सबको समान दिये लेकिन कोई बच्चों ने रत्नों को बढ़ाया है और कोई ने रत्नों को बढ़ाया नहीं। कोई भरपूर है; कोई अखुट मालामाल है; कोई समय प्रमाण कार्य में लगा रहे हैं, कोई सदा कार्य में लगाकर एक का पदमगुणा बढ़ा रहे हैं; कोई जितना कार्य में लगाना चाहिए उतना लगा नहीं सकते, इसलिए रत्नों की वैल्यू को जितना समझना चाहिए उतना समझ नहीं रहे हैं। जितना मिला है वह बुद्धि में धारण तो किया लेकिन कार्य में लाने से जो सुख, खुशी, शक्ति, शान्ति और निर्विघ्न स्थिति की प्राप्ति की अनुभूति होनी चाहिए वह नहीं कर पाते हैं। इसका कारण मनन शक्ति की कमी है क्योंकि मनन करना अर्थात् जीवन में समाना, धारण करना। मनन न करना अर्थात् सिर्फ बुद्धि तक धारण करना। वह जीवन के हर कार्य में, हर कर्म में लगाते हैं-चाहे अपने प्रति, चाहे अन्य आत्माओं के प्रति और दूसरे सिर्फ बुद्धि में याद रखते अर्थात् धारण करते हैं।

जैसे कोई भी स्थूल खजाने को सिर्फ तिजोरी में वा लाकर में रख लो और समय प्रमाण वा सदा काम में नहीं लगाओ तो वह खुशी की प्राप्ति नहीं होती है, सिर्फ दिल का दिलासा रहता है कि हमारे पास है। न बढ़ेगा, न अनुभूति होगी। ऐसे, ज्ञान रत्न अगर सिर्फ बुद्धि में धारण किया, याद रखा, मुख से वर्णन किया-पॉइन्ट बहुत अच्छी है, तो थोड़े समय के लिए अच्छी पॉइन्ट का अच्छा नशा रहता है लेकिन जीवन में, हर कर्म में उन ज्ञान रत्नों को लाना है क्योंकि ज्ञान रत्न भी हैं, ज्ञान रोशनी भी है, ज्ञान शक्ति भी है इसलिए अगर इसी विधि से कर्म में नहीं लाया तो बढ़ता नहीं है वा अनुभूति नहीं होती है। ज्ञान पढ़ाई भी है, ज्ञान लड़ाई के श्रेष्ठ शस्त्र भी हैं। यह है ज्ञान का मूल्य। मूल्य को जानना अर्थात् कार्य में लगाना और जितना-जितना कार्य में लगाते हैं उतना शक्ति का अनुभव करते जाते हैं। जैसे शस्त्र को समय प्रमाण यूज़ नहीं करो तो वह शस्त्र बेकार हो जाता है अर्थात् उसकी जो वैल्यू है, वह उतनी नहीं रहती है। ज्ञान भी शस्त्र है, अगर मायाजीत बनने के समय शस्त्र को कार्य में नहीं लगाया तो जो वैल्यू है, उसको कम कर दिया क्योंकि लाभ नहीं लिया। लाभ लेना अर्थात् वैल्यू रखना। ज्ञान रत्न सबके पास हैं क्योंकि अधिकारी हो। लेकिन भरपूर रहने में नम्बरवार हो। मूल कारण सुनाया-मनन शक्ति की कमी।

मनन शक्ति बाप के खजाने को अपना खजाना अनुभव कराने का आधार है। जैसे स्थूल भोजन हजम होने से खून बन जाता है क्योंकि भोजन अलग है, उसको जब हज़म कर लेते हो तो वह खून के रूप में अपना बन जाता है। ऐसे मनन शक्ति से बाप का खजाना सो मेरा खजाना-यह अपना अधिकार, अपना खजाना अनुभव होता है। बापदादा पहले भी सुनाते रहे हैं – अपनी घोट तो नशा चढ़े अर्थात् बाप के खजाने को मनन शक्ति से कार्य में लगाकर प्राप्तियों की अनुभूति करो तो नशा चढ़े। सुनने के समय नशा रहता है लेकिन सदा क्यों नहीं रहता? इसका कारण है कि सदा मनन शक्ति से अपना नहीं बनाया है। मनन शक्ति अर्थात् सागर के तले में जाकर अन्तर्मुखी बन हर ज्ञान-रत्न की गुह्यता में जाना। सिर्फ रिपीट नहीं करना है लेकिन हर एक पॉइन्ट का राज़ क्या है और हर पॉइन्ट को किस समय, किस विधि से कार्य में लागाना है और हर पॉइन्ट को अन्य आत्माओं के प्रति सेवा में किस विधि से कार्य में लगाना है – यह चारों ही बातें हर एक पॉइन्ट को सुनकर मनन करो। साथ-साथ मनन करते प्रैक्टिकल में उस राज़ के रस में चले जाओ, नशे की अनुभूति में आओ। माया के भिन्न-भिन्न विघ्नों के समय वा प्रकृति के भिन्न-भिन्न परिस्थितियों के समय काम में लगाकर देखो कि जो मैंने मनन किया कि इस परिस्थिति के प्रमाण वा विघ्न के प्रमाण यह ज्ञान रत्न मायाजीत बना सकते वा बनाने वाला है, वह प्रैक्टिकल हुआ अर्थात् मायाजीत बने? वा सोचा था मायाजीत बनेंगे लेकिन मेहनत करनी पड़ी वा समय व्यर्थ गया? इससे सिद्ध है कि विधि यथार्थ नहीं थी, तब सिद्धि नहीं मिली। यूज़ करने का तरीका भी चाहिये, अभ्यास चाहिए। जैसे साइन्स वाले भी बहुत पावरफुल बॉम्बस (शक्तिशाली गोले) ले जाते हैं। समझते हैं-बस इससे अब तो जीत लेंगे। लेकिन यूज़ करने वाले को यूज़ करने का ढंग नहीं आता तो पावरफुल बॉम्ब होते भी यहाँ-वहाँ ऐसे स्थान पर जाकर गिरता जो व्यर्थ चला जाता। कारण क्या हुआ? यूज़ करने की विधि ठीक नहीं। ऐसे, एक-एक ज्ञान-रत्न अति अमूल्य है। ज्ञान रत्न वा ज्ञान की शक्ति के आगे परिस्थिति वा विघ्न ठहर नहीं सकते। लेकिन अगर विजय नहीं होती है तो समझो यूज़ करने की विधि नहीं आती है। दूसरी बात-मनन शक्ति का अभ्यास सदा न करने से समय पर बिना अभ्यास के अचानक काम में लगाने का प्रयत्न करते हो, इसलिए धोखा खा लेते हो। यह अलबेलापन आ जाता है-ज्ञान तो बुद्धि में है ही, समय पर काम में लगा लेंगे। लेकिन सदा का अभ्यास, बहुतकाल का अभ्यास चाहिए। नहीं तो उस समय सोचने वाले को क्या टाइटल देंगे? कुम्भकरण। उसने क्या अलबेलापन किया? यही सोचा ना कि आने दो, आयेंगे तो जीत लेंगे। तो ऐसा सोचना कि समय पर हो जायेगा-यह अलबेलापन धोखा दे देता, इसलिए हर रोज़ मनन शक्ति को बढ़ाते जाओ।

रिवाइज कोर्स में वा अव्यक्त, जो रोज़ सुनते हो, तो मनन शक्ति को बढ़ाने के लिए रोज़ कोई न कोई एक विशेष पॉइन्ट बुद्धि में धारण करो और जो 4 बातें सुनाई, उस विधि से अभ्यास करो। चलते-फिरते, हर कर्म करते-चाहे स्थूल कर्म करते हो, चाहे सेवा का कर्म करते हो लेकिन सारा दिन मनन चलता रहे। चाहे बिजनेस करते हो वा दफ्तर का काम करते हो, चाहे सेवाकेन्द्र में सेवा करते हो लेकिन जिस समय भी बुद्धि थोड़ा फ्री हो तो अपने मनन शक्ति के अभ्यास को बार-बार दौड़ाओ। कई काम ऐसे होते हैं जो कर्म कर रहे हैं, उसके साथ-साथ और भी सोच सकते हैं। बहुत थोड़ा समय होता है जो ऐसा कार्य होता है जिसमें बुद्धि का फुल अटेन्शन देना होता है, नहीं तो डबल तरफ बुद्धि चलती रहती है। ऐसा समय अगर अपनी दिनचर्या में नोट करो तो बीच-बीच में बहुत समय मिलता है। मनन शक्ति के लिए विशेष समय मिले तब अभ्यास करेंगे-ऐसी कोई बात नहीं है। चलते-फिरते भी कर सकते हो। अगर एकान्त का समय मिलता है तो बहुत अच्छा है। और महीनता में जाए हर पॉइन्ट के स्पष्टीकरण में जाओ, विस्तार में लाओ तो बहुत मजा आयेगा। लेकिन पहले पॉइन्ट के नशे की स्थिति में स्थित हो के करना, फिर बोर नहीं होंगे। नहीं तो सिर्फ रिपीट कर लेते हैं, फिर कहते-यह तो हो गया, अब क्या करें?

जैसे कई स्वदर्शन चक्र चलाने में हंसाते हैं ना – चक्र क्या चलायें, 5 मिनट में चक्र पूरा हो जाता है! स्थिति का अनुभव करने नहीं आता है तो सिर्फ रिपीट कर लेते हैं – सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग, इतने जन्म, इतनी आयु, इतना समय है…बस, पूरा हो गया। लेकिन स्वदर्शन चक्रधारी बनना अर्थात् नॉलेजफुल, पावरफुल स्थिति का अनुभव करना। पॉइन्ट के नशे में स्थित रहना, राज़ में राजयुक्त बनना-ऐसा अभ्यास हर पॉइन्ट में करो। यह तो एक स्वदर्शन चक्र की बात सुनाई। ऐसे, हर ज्ञान की पॉइन्ट को मनन करो और बीच-बीच में अभ्यास करो। ऐसे नहीं सिर्फ आधा घण्टा मनन किया। समय मिले और बुद्धि मनन के अभ्यास में चली जाए। मनन शक्ति से बुद्धि बिजी रहेगी तो स्वत: ही सहज मायाजीत बन जायेंगे। बिजी देख माया आपे ही किनारा कर लेगी। माया आये और युद्ध करो, भगाओ; फिर कभी हार, कभी जीत हो – यह चींटी मार्ग का पुरूषार्थ है। अब तो तीव्र पुरूषार्थ करने का समय है, उड़ने का समय है इसलिए मनन शक्ति से बुद्धि को बिजी रखो। इसी मनन शक्ति से याद की शक्ति में मग्न रहना – यह अनुभव सहज हो जायेगा। मनन मायाजीत और व्यर्थ संकल्पों से भी मुक्त कर देता है। जहाँ व्यर्थ नहीं, विघ्न नहीं तो समर्थ स्थिति वा लगन में मग्न रहने की स्थिति स्वत: ही हो जाती है।

कई सोचते हैं – बीजरूप स्थिति या शक्तिशाली याद की स्थिति कम रहती है या बहुत अटेन्शन देने के बाद अनुभव होता है। इसका कारण अगले बार भी सुनाया कि लीकेज है, बुद्धि की शक्ति व्यर्थ के तरफ बंट जाती है। कभी व्यर्थ संकल्प चलेंगे, कभी साधारण संकल्प चलेंगे। जो काम कर रहे हैं उसी के संकल्प में बुद्धि का बिजी रहना – इसको कहते हैं साधारण संकल्प। याद की शक्ति या मनन शक्ति जो होनी चाहिए वह नहीं होती और अपने को खुश कर लेते कि आज कोई पाप कर्म नहीं हुआ, व्यर्थ नहीं चला, किसको दु:ख नहीं दिया। लेकिन समर्थ संकल्प, समर्थ स्थिति, शक्तिशाली याद रही? अगर वह नहीं रही तो इसको कहेंगे साधारण संकल्प। कर्म किया लेकिन कर्म और योग साथ-साथ नहीं रहा। कर्म कर्ता बने लेकिन कर्मयोगी नहीं बने इसलिए कर्म करते भी, या मनन शक्ति या मग्न स्थिति की शक्ति, दोनों में से एक अनुभूति सदा रहनी चाहिए। यह दोनों स्थितियां शक्तिशाली सेवा कराने के आधार हैं। मनन करने वाले अभ्यास होने के कारण जिस समय जो स्थिति बनाने चाहें वह बना सकेंगे। लिंक रहने से लीकेज खत्म हो जायेगी और जिस समय जो अनुभूति-चाहे बीजरूप स्थिति की, चाहे फरिश्ते रूप की, जो करना चाहो वह सहज कर सकेंगे क्योंकि जब ज्ञान की स्मृति है तो ज्ञान के सिमरण से ज्ञानदाता स्वत: ही याद रहता। तो समझा, मनन कैसे करना है? कहा था ना कि मनन का फिर सुनायेंगे। तो आज मनन करने की विधि सुनाई। माया के विघ्नों से सदा विजयी बनना वा सदा सेवा में सफलता का अनुभव करना, इसका आधार मनन शक्ति है। समझा? अच्छा!

सर्व ज्ञान-सागर के ज्ञानी तू आत्मा बच्चों को, सदा मनन शक्ति द्वारा सहज मायाजीत बनने वाली श्रेष्ठ आत्माओं को, सदा मनन शक्ति के अभ्यास को आगे बढ़ाने वाले, मनन से मग्न स्थिति का अनुभव करने वाले, सदा ज्ञान के रत्नों का मूल्य जानने वाले, सदा हर कर्म में ज्ञान की शक्ति को कार्य में लाने वाले, ऐसे सदा श्रेष्ठ स्थिति में रहने वाले विशेष वा अमूल्य रत्नों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

पार्टियों से अव्यक्त बापदादा की मुलाकात:- स्वयं को तीव्र पुरूषार्थी आत्मायें अनुभव करते हो? क्योंकि समय बहुत तीव्रगति से आगे बढ़ रहा है। जैसे समय आगे बढ़ रहा है, तो समय पर मंजिल पर पहुँचने वाले को किस गति से चलना पड़े? समय कम है और प्राप्ति ज्यादा करनी है। तो थोड़े समय में अगर ज्यादा प्राप्ति करनी हो तो तीव्र करना पड़ेगा ना। समय को देख रहे हो और अपने पुरूषार्थ की गति को भी जानते हो। तो समय अगर तेज है और अपनी गति तेज नहीं है तो समय अर्थात् रचना आप रचता से भी तेज हुई। रचता से रचना तेज चली जाए तो उसे अच्छी बात कहेंगे? रचना से रचता आगे होना चाहिए। सदा तीव्र पुरूषार्थी आत्मायें बन आगे बढ़ने का समय है। अगर आगे बढ़ते कोई भी साइडसीन्स को देख रुकते हो, तो रुकने वाले ठीक समय पर पहुँच नहीं सकेंगे। कोई भी माया की आकर्षण साइड-सीन है। साइडसीन पर रूकने वाला मंजिल पर कैसे पहुँचेगा? इसलिए सदैव तीव्र पुरूषार्थी बन आगे बढ़ते चलो। ऐसे नहीं समय पर पहुँच ही जायेंगे, अभी तो समय पड़ा है। ऐसे सोचकर अगर धीमी गति से चलेंगे तो समय पर धोखा मिल जायेगा। बहुत काल का तीव्र पुरूषार्थ का संस्कार, अन्त में भी तीव्र पुरूषार्थ का अनुभव करायेगा। तो सदा तीव्र पुरूषार्थी। कभी तीव्र, कभी कमजोर-नहीं। ऐसे नहीं थोड़ी-सी बात हुई कमजोर बन जाओ। इसको तीव्र पुरूषार्थी नहीं कहेंगे। तीव्र पुरूषार्थी कभी रूकते नहीं, उड़ते हैं। तो उड़ते पंछी बन उड़ती कला का अनुभव करते चलो। एक दो को भी सहयोग दे तीव्र पुरूषार्थी बनाते चलो। जितनी औरों की सेवा करेंगे उतना स्वयं का उमंग-उत्साह बढ़ता रहेगा।

विदाई के समय (दादी जानकी जी विदेश में जाने की छुट्टी बापदादा से ले रही हैं)

देश-विदेश में सेवा का उमंग-उत्साह अच्छा है। जहाँ उमंग-उत्साह है, वहाँ सफलता भी होती है। सदा यह अटेन्शन रखना है कि पहले अपना उमंग-उत्साह हो, संगठन की शक्ति हो। स्नेह की शक्ति, सहयोग की शक्ति हो तो सफलता उसी अनुसार होती है। यह है धरनी। जैसे धरनी ठीक होती है तो फल भी ऐसा ही निकलता है और अगर टेप्रेरी (अस्थायी) धरनी को ठीक करके बीज डाल दो तो फल भी थोड़े समय के लिए मिलेगा, सदाकाल के लिए फल नहीं मिलेगा। तो सफलता के फल के पहले सदा धरनी को चेक करो। बाकी जो करते हैं उनका जमा तो हो ही जाता है। अभी भी खुशी मिलती है और भविष्य तो है ही। अच्छा!

भगवान कहा जाता है निराकार को। वह बाप है शान्तिधाम में रहने वाला। जहाँ तुम सभी आत्मायें रहती हो, जिसको निर्वाण धाम अथवा वानप्रस्थ कहा जाता है फिर तुम आत्माओं को शरीर धारण कर यहाँ पार्ट बजाना होता है। आधाकल्प सुख का पार्ट, आधाकल्प है दु:ख का। जब दु:ख का अन्त होता है तब बाप कहते हैं मैं आता हूँ। यह ड्रामा बना हुआ है। तुम बच्चे यहाँ आते हो भट्ठी में। यहाँ और कुछ बाहर का याद नहीं आना चाहिए। यहाँ है ही मात-पिता और बच्चे। और यहाँ शूद्र सम्प्रदाय है नहीं। जो ब्राह्मण नहीं हैं उनको शूद्र कहा जाता है। उनका संग तो यहाँ है ही नहीं। यहाँ है ही ब्राह्मणों का संग। ब्राह्मण बच्चे जानते हैं कि शिवबाबा ब्रह्मा द्वारा हमको नर्क से स्वर्ग की राजधानी का मालिक बनाने आये हैं। अब हम मालिक नहीं हैं क्योंकि हम पतित हैं। हम पावन थे फिर 84 का चक्र लगाए सतो-रजो-तमो में आये हैं। सीढ़ी में 84 जन्मों का हिसाब लिखा हुआ है। बाप बैठकर बच्चों को समझाते हैं। जिन बच्चों से पहले-पहले मिलते हैं फिर उन्हों को ही पहले-पहले सतयुग में आना है। तुमने 84 जन्म लिए हैं। रचता और रचना की सारी नॉलेज एक बाप के पास ही है। वही मनुष्य सृष्टि का बीजरूप है। जरूर बीज में ही नॉलेज होगी कि इस झाड़ की कैसे उत्पत्ति, पालना और विनाश होता है। यह तो बाप ही समझाते हैं। तुम अब जानते हो हम भारतवासी गरीब हैं। जब देवी-देवता थे तो कितने साहूकार थे। हीरों से खेलते थे। हीरों के महलों में रहते थे। अब बाप स्मृति दिलाते हैं कि तुम कैसे 84 जन्म लेते हो। बुलाते भी हैं – हे पतित-पावन, गरीब-निवाज़ बाबा आओ। हम गरीबों को स्वर्ग का मालिक फिर से बनाओ। स्वर्ग में सुख घनेरे थे, अब दु:ख घनेरे हैं। बच्चे जानते हैं इस समय सब पूरे पतित बन पड़े हैं। अभी कलियुग का अन्त है फिर सतयुग चाहिए। पहले भारत में एक आदि सनातन देवी-देवता धर्म था, अब वह प्राय:लोप हो गया है और सब अपने को हिन्दू कहलाते हैं। इस समय क्रिश्चियन बहुत हो गये हैं क्योंकि हिन्दू धर्म वाले बहुत कनवर्ट हो गये हैं। तुम देवी-देवताओं का असुल कर्म श्रेष्ठ था। तुम पवित्र प्रवृत्ति मार्ग वाले थे। अब रावण राज्य में पतित प्रवृत्ति मार्ग वाले बन गये हो, इसलिए दु:खी हो। सतयुग को कहा जाता है शिवालय। 

शिवबाबा का स्थापन किया हुआ स्वर्ग। बाप कहते हैं मैं आकर तुम बच्चों को शूद्र से ब्राह्मण बनाए तुमको सूर्यवंशी, चन्द्रवंशी राजधानी का वर्सा देता हूँ। यह बापदादा है, इनको भूलो मत। शिवबाबा ब्रह्मा द्वारा हमको स्वर्ग का लायक बना रहे हैं क्योंकि पतित आत्मा तो मुक्तिधाम में जा न सके, जब तक पावन न बनें। अभी बाप कहते हैं मैं आकर तुमको पावन बनने का रास्ता बताता हूँ। मैं तुमको पद्मपति स्वर्ग का मालिक बनाकर गया था, बरोबर तुमको स्मृति आई है कि हम स्वर्ग के मालिक थे। उस समय हम बहुत थोड़े थे। अभी तो कितने ढेर मनुष्य हैं। सतयुग में 9 लाख होते हैं, तो बाप कहते हैं मैं आकर ब्रह्मा द्वारा स्वर्ग की स्थापना, शंकर द्वारा विनाश करा देता हूँ। तैयारी सब कर रहे हैं, कल्प पहले मुआफिक। कितने बॉम्ब्स बनाते हैं। 5 हज़ार वर्ष पहले भी यह महाभारत लड़ाई लगी थी। भगवान ने आकर राजयोग सिखाए मनुष्य को नर से नारायण बनाया था। तो जरूर कलियुगी पुरानी दुनिया का विनाश होना चाहिए। सारे भंभोर को आग लगेगी। नहीं तो विनाश कैसे हो? आजकल बॉम्ब्स में आग भी भरते हैं। मूसलधार बरसात, अर्थ क्वेक्स आदि सब होंगी तब तो विनाश होगा। पुरानी दुनिया का विनाश, नई दुनिया की स्थापना होती है। यह है संगमयुग। रावण राज्य मुर्दाबाद हो रामराज्य जिंदाबाद होता है। नई दुनिया में कृष्ण का राज्य था। लक्ष्मी-नारायण के बदले कृष्ण का नाम ले लेते हैं क्योंकि कृष्ण है सुन्दर, सबसे प्यारा बच्चा। 

मनुष्यों को तो पता नहीं है ना। कृष्ण अलग राजधानी का, राधे अलग राजधानी की थी। भारत सिरताज था। अभी कंगाल है, फिर बाप आकर सिरताज बनाते हैं। अब बाप कहते हैं पवित्र बनो और मामेकम् याद करो तो तुम सतोप्रधान बन जायेंगे। फिर जो सर्विस कर आप समान बनायेंगे, वह ऊंच पद पायेंगे, डबल सिरताज बनेंगे। सतयुग में राजा-रानी और प्रजा सब पवित्र रहते हैं। अभी तो है ही प्रजा का राज्य। दोनों ताज नहीं हैं। बाप कहते हैं जब ऐसी हालत होती है तब मैं आता हूँ। अभी मैं तुम बच्चों को राजयोग सिखा रहा हूँ। मैं ही पतित-पावन हूँ। अब तुम मुझे याद करो तो तुम्हारी आत्मा से खाद निकल जाए। फिर सतोप्रधान बन जायेंगे। अभी श्याम से सुन्दर बनना है। सोने में खाद पड़ने से काला हो जाता है तो अब खाद को निकालना है। बेहद का बाप कहते हैं तुम काम चिता पर बैठ काले बन गये हो, अब ज्ञान चिता पर बैठो और सबसे ममत्व मिटा दो। तुम आशिक हो मुझ एक माशूक के। भगत सब भगवान को याद करते हैं। सतयुग-त्रेता में भक्ति होती नहीं। वहाँ तो है ज्ञान की प्रालब्ध। बाप आकर ज्ञान से रात को दिन बनाते हैं। ऐसे नहीं कि शास्त्र पढ़ने से दिन हो जायेगा। वह है भक्ति की सामग्री। ज्ञान सागर पतित-पावन एक ही बाप है, वह आकर सृष्टि चक्र का ज्ञान बच्चों को समझाते हैं और योग सिखाते हैं। ईश्वर के साथ योग लगाने वाले योग योगेश्वर और फिर बनते हैं राज राजेश्वर, राज राजेश्वरी। तुम ईश्वर द्वारा राजाओं का राजा बनते हो। जो पावन राजायें थे फिर वही पतित बनते हैं। आपेही पूज्य फिर आपेही पुजारी बन जाते हैं। अब जितना हो सके याद की यात्रा में रहना है। जैसे आशिक माशूक को याद करते हैं ना। जैसे कन्या की सगाई होने से फिर एक-दो को याद करते रहते हैं। अभी यह जो माशूक है, उनके तो बहुत आशिक हैं भक्ति मार्ग में। सब दु:ख में बाप को याद करते हैं – हे भगवान दु:ख हरो, सुख दो। यहाँ तो न शान्ति है, न सुख है। सतयुग में दोनों हैं।

अभी तुम जानते हो हम आत्मायें कैसे 84 का पार्ट बजाते हैं। ब्राह्मण, देवता, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र बनते हैं। 84 की सीढ़ी बुद्धि में है ना। अब जितना हो सके बाप को याद करना है तो पाप कट जाएं। कर्म करते हुए भी बुद्धि में बाप की याद रहे। बाबा से हम स्वर्ग का वर्सा ले रहे हैं। बाप और वर्से को याद करना है। याद से ही पाप कटते जायेंगे। जितना याद करेंगे तो पवित्रता की लाइट आती जायेगी। खाद निकलती जायेगी। बच्चों को जितना हो सके टाइम निकाल याद का उपाय करना है। सवेरे-सवेरे टाइम अच्छा मिलता है। यह पुरूषार्थ करना है। भल गृहस्थ व्यवहार में रहो, बच्चों की सम्भाल आदि करो परन्तु यह अन्तिम जन्म पवित्र बनो। काम चिता पर नहीं चढ़ो। अभी तुम ज्ञान चिता पर बैठे हो। यह पढ़ाई बहुत ऊंची है, इसमें सोने का बर्तन चाहिए। तुम बाप को याद करने से सोने का बर्तन बनते हो। याद भूलने से फिर लोहे का बर्तन बन जाते हो। बाप को याद करने से स्वर्ग के मालिक बनेंगे। यह तो बहुत सहज है। इसमें पवित्रता मुख्य है। याद से ही पवित्र बनेंगे और सृष्टि चक्र को याद करने से स्वर्ग का मालिक बनेंगे। तुम्हें घरबार नहीं छोड़ना है।

गृहस्थ व्यवहार में भी रहना है। बाप कहते हैं 63 जन्म तुम पतित दुनिया में रहे हो। अब शिवालय अमरलोक में चलने के लिए तुम यह एक जन्म पवित्र रहे तो क्या हुआ। बहुत कमाई हो जायेगी। 5 विकारों पर जीत पानी है तब ही जगतजीत बनेंगे। नहीं तो पद पा नहीं सकेंगे। बाप कहते हैं मरना तो सबको है। यह अन्तिम जन्म है फिर तुम जाए नई दुनिया में राज्य करेंगे। हीरे-जवाहरातों की खानियां भरपूर हो जायेंगी। वहाँ तुम हीरे-जवाहरातों से खेलते रहेंगे। तो ऐसे बाप के बनकर उनकी मत पर भी चलना चाहिए ना। श्रीमत से ही तुम श्रेष्ठ बनेंगे। रावण की मत से तुम भ्रष्टाचारी बने हो। अब बाप की श्रीमत पर चल तमोप्रधान से सतोप्रधान बनना है। बाप को याद करना है और कोई तकलीफ बाप नहीं देते हैं। भक्ति मार्ग में तो तुमने बहुत धक्के खाये हैं। अब सिर्फ बाप को याद करो और सृष्टि चक्र को याद करो। स्वदर्शन चक्रधारी बनो तो तुम 21 जन्मों के लिए चक्रवर्ती राजा बन जायेंगे। अनेक बार तुमने राज्य लिया है और गँवाया है। आधाकल्प है सुख, आधाकल्प है दु:ख। बाप कहते हैं – मैं कल्प-कल्प संगम पर आता हूँ। तुमको सुखधाम का मालिक बनाता हूँ। अभी तुमको स्मृति आई है, हम कैसे चक्र लगाते हैं। यह चक्र बुद्धि में रखना है। बाप है ज्ञान का सागर। तुम यहाँ बेहद के बाप के सामने बैठे हो। ऊंच ते ऊंच भगवान प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा तुमको वर्सा देते हैं। तो अब विनाश होने के पहले बाप को याद करो, पवित्र बनो। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

वरदान:-

सारी पढ़ाई और शिक्षाओं का सार यह तीन शब्द हैं:- 1-कर्मबन्धन तोड़ने हैं। 2-अपने संस्कार-स्वभाव को मोड़ना है और 3- एक बाप से सर्व सम्बन्ध जोड़ने हैं – यही तीन शब्द सम्पूर्ण विजयी बना देंगे, इसके लिए सदा यही स्मृति रहे कि जो भी इन नयनों से विनाशी चीज़े देखते हैं वह सब विनाश हुई पड़ी हैं। उन्हें देखते भी अपने नये सम्बन्ध, नई सृष्टि को देखते रहो तो कभी हार हो नहीं सकती।

स्लोगन:-

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